जो दिल को छू लेते हैं

Rose

(*) चिराग़ घर का हो, महफिल का हो कि मंदिर का,
हवा के पास कोई मसलहत नहीं होती

(*) हम आह भी भरते हैं तो हो जाते हैं बदनाम,
वो कत्ल भी करते हैं तो चर्चा नहीं होता।

(*) हजार बार ज़माना उधर से गुजरा है,
नयी-नयी से है कुछ तेरी रहगुजर फिर भी।

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